Wednesday, 15 May 2013

पर्यावरण दिवस पर..........


एक कहावत है कि कभी भी बात इतनी नहीं बिगड़ती कि उसे कभी संभाला न जा सके। 'पर्यावरण ' पर भी यही बात लागू होती है । आइये देखें, इसे रोकने के लिए हम-आप क्या कर सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण के बारे में पढ़े और साथियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें । इससे आप पर्यावरण संरक्षण में अपनी भूमिका को समझ सकेंगे । 'इनवॉयरनमेंट क्लब' का गठन इस दिशा में अच्छी पहल साबित हो सकती है। हम जब भी बिजली का इस्तेमाल करते हैं, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ती है। बिजली बचाकर आप न केवल ऊर्जा, बल्कि पृथ्वी को भी बचा सकते हो। ईधन चालित व्यक्तिगत वाहनों की जगह कार पूल/बस में सफर को वरीयता देनी चाहिए। छोटी दूरी के लिए पैदल चलने या साइकिल का इस्तेमाल करें । बिजली की जगह सोलर एनर्जी के इस्तेमाल से ग्रीन हाउस प्रभाव को सीमित किया जा सकता है। रोशनी, खाना बनाने और पानी गर्म करने के लिए सोलर एनर्जी प्रोडॅक्ट्स आसानी से उपलब्ध है। अधिक से अधिक मात्रा में वृक्ष लगायें और इनकी देखभाल करें । यही वह भरोसेमंद सिपाही हैं; जो पृथ्वी को बचाने की इस लड़ाई में सच्चे साथी साबित होंगे।

आज ‪पर्यावरण दिवस‬ है ,‎
पेड़ पौधे लगाओ‬ 
और जीवन
बचाओ।‪

Friday, 5 April 2013

देखा है…


मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है,
उम्र के साथ जिंदगी को ढंग बदलते देखा है .. !!

वो जो चलते थे तो शेर के चलने का होता था गुमान,
उनको भी पाँव उठाने के लिए सहारे को तरसते देखा है !!

जिनकी नजरों की चमक देख सहम जाते थे लोग,
उन्ही नजरों को बरसात की तरह रोते देखा है !!

जिनके हाथों के जरा से इशारे से टूट जाते थे पत्थर,
उन्ही हाथों को पत्तों की तरह थर थर काँपते देखा है !!

जिनकी आवाज़ से कभी बिजली के कड़कने का होता था भरम,
उनके होठों पर भी जबरन चुप्पी का ताला लगा देखा है !!

ये जवानी ,ये ताकत ,ये दौलत सब रब की इनायत है,
इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान हुआ देखा है !!

अपने आज पर इतना ना इतराना मेरे यारों ...
वक्त की धारा में अच्छे अच्छों को मजबूर हुआ देखा है .. !!!
कर सको तो किसी को खुश करो दुःख देते तो हजारों को देखा है..!!
            लव यू "पापा"

Sunday, 17 March 2013

इतने अनजान क्यो हो………





न जाने क्यों में तुमसे इतना प्यार करती हुँ
तुमसे हरवक्त मिलने का इंतजार करती हुँ
मेरी चाहतो पर क्यों इतना अनजान हो
झील सी गहरी इन आंखों में कुछ सपने लिए
में तुमसे मिलने का इंतजार करती हुँ
हर आहट पर हमे लगे की वो आ गए
न जाने कब आप हमारे दिल में समा गए
देखते ही देखते आप मेरे इस दिल में
अपनी एक बहुत ही खास जगह बना गए
अहसास अपने प्यार का मुझको दिला गए
मोहब्बत की दुनिया में मुझको भी डुबा गए
न जाने क्या बात है आपको चाहने में
मुझे जैसे पत्थर को मोम जैसा बना गए……

मेरे प्यारे दोस्त तुम्हारे लिये…~~®®®~~


Saturday, 16 June 2012

मेरे पापा आप हो सबसे ख़ास !!!

पापा कभी पसंद नहीं पूछते फिर भी हर पसंद की
चीज़ बिन कहे ही ला देते हैं ,जाने कैसे।
बात करना उन्हें पसंद नहीं चुप ही रहते हैं अक्सर
मन की सारी बातें फिर भी जान जाते हैं मन से
बिन कहे सब कह जाते हैं,जाने कैसे।
पापा कुछ सख्त सी दूरियाँ रखते हैं हमारे साथ

पर किसी और की सख्ती मंज़ूर नहीं उन्हें
अपने इस प्रेम को सख्ती से छुपाते हैं,जाने कैसे।
फर्क नहीं उन्हें हम दूर हों या पास या कि किसके साथ
जबकि फर्क है उन्हें हम कहाँ हैं और हैं किसके साथ
कहते नहीं जताते भी नहीं छुपाते हैं जज़्बात,जाने कैसे।
उठ कर चले जाते हैं जब भी कोई बात होती है भावुक सी
कह देते हैं फ़ालतू बातें करते हो तुम सभी
अपनी भावनाओं को कभी बहने नहीं देते ,जाने कैसे।
पापा का जीवन हूँ मै और मेरा सब कुछ वो
न कभी कहते हैं खुद, न कभी मुझे कहने देते हैं
जब भी कहना चाहूँ बात बदल दते हैं ,जाने कैसे।
पर आज कहतेहैं , न रोक सकेंगे आप मेरी आवाज़
मेरे जज़्बात, मेरे पापा आप हो सबसे ख़ास !!!

Sunday, 6 May 2012

"उम्‍मीद का दीया"

हम कितने भ्रष्ट हो सकते हैं. या यूं कहें कि भ्रष्टाचार के कितने किस्सों और कहानियों को सुने और भ्रष्टाचार की नित नई परिभाषा को जानने के बाद हम कब तक अपने आप को चौंकाने का दम रखते हैं. हम-यानी, भारतवर्ष की आम जनता. हमारे जीवन में भ्रष्टाचार की इतनी ज्यादा अहमियत या जगह, क्यों है? सुबह से लेकर शाम तक, हमारे हर काम में जो हमारे घर की परिधि से बाहर हो, उसमें किसी ना किसी रुप में भ्रष्टाचार हमारे चारो ओर क्यों होता है, क्यों हमें इससे निरंतर जूझना पड़ता है. क्या थके नहीं हैं, हम अबतक इस शब्द -भ्रष्टाचार, से?
                                              हर दिन किसी ना किसी नेता, अफसर, राजनीतिक कार्यकर्ता, बिजनेसमैन, सीईओ, शरीके बड़े आदमी की करनी और उससे होने वाले करोड़ों, अरबों के राष्ट्रीय नुकसान की बात पिछले 63 सालों से देखते या सुनते आये हैं. अब तो आदत होने लगी है. अगर टीवी या अखबार में किसी के घूस लेने या देने की बात ना दिखें, तो अटपटा लगता है- खलने लगता है. लगता है कि आज तो देश में कुछ हुआ ही नहीं. महसूस होता है, जैसे सरकार और सरकारी तंत्र काम ही नहीं कर रहा. ...भई बिना लेन-देन के हम कहां आगे बढ़ते हैं.
                                         वक्त अब हम सबों से ये सवाल करने लगा है कि आखिर कब तक हम अपने समाज, अपने देश, अपनी जमीन से गद्दारी करते रहेंगे? भ्रष्टाचार नामक इस दीमक से हमें कब छुटकारा मिलेगा? एक आम भारतवासी कब अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर, देशहित की बात सोचेगा? हर बार ये कहा जाता है कि भ्रष्टाचार वो कीड़ा है, जिसपर रोक-थाम लगाने की जिम्मेदारी ऊपर से शुरु होता है. लेकिन अब इस परिभाषा को बदलने की जरुरत है. इस कीड़े को हर भारतवासी को अपने स्तर पर ही मारना होगा. ये लड़ाई हम सबों की है, ना कि सिर्फ कुछ लोगों की. अगर मुन्नाभाई फिल्म में संजय दत्त भ्रष्टाचार का मुकाबला गुलाब के साथ कर सकते हैं, तो क्या हमारे बगीचों में गुलाब की कमी हो गयी है?

Thursday, 12 April 2012

हाय पटना! हाय पटना! हाय पटना!……

                                                   फोटो--google

किस्सों में पढ़ा था कहीं
था सुनहरा एक जगह अपना
जब सारी दुनिया सो रही थी
तब जगा हुआ था पटना।

शून्य कोई खोज रहा था
शान्ति कोई ला रहा था
शिक्षा कोई दे रहा था
शिक्षित कोई हो रहा था।

आंदोलनों की शुरुआत हुई है
साम्प्रदायिकता की हार हुई है
जंगों के बाद राजाओं की
अंतरात्मा से तकरार हुई है।

जीवन का चक्र है शायद
या घटी है कोई दुर्घटना।
जब सारी दुनिया जाग चुकी
अब सो रहा है पटना।

पहले था पाटलीपुत्र,
फिर हुआ पटना
पत्तन तो रहा नहीं
घटने लगी घटना ।

हाय पटना! हाय पटना! हाय पटना!


Friday, 9 March 2012

मैं नारी




मैं नारी सदियों से
स्व अस्तित्व की खोज में
फिरती हूँ मारी-मारी
कोई न मुझको माने जन
सब ने समझा व्यक्तिगत धन
जनक के घर में कन्या धन
दान दे मुझको किया अर्पण
जब जन्मी मुझको समझा कर्ज़
दानी बन अपना निभाया फर्ज़
साथ में कुछ उपहार दिए
अपने सब कर्ज़ उतार दिए
सौंप दिया किसी को जीवन
कन्या से बन गई पत्नी धन
समझा जहां पैरों की दासी
अवांछित ज्यों कोई खाना बासी
जब चाहा मुझको अपनाया
मन न माना तो ठुकराया
मेरी चाहत को भुला दिया
कांटों की सेज़ पे सुला दिया
मार दी मेरी हर चाहत
हर क्षण ही होती रही आहत
माँ बनकर जब मैनें जाना
थोडा तो खुद को पहिचाना
फिर भी बन गई मैं मातृ धन
नहीं रहा कोई खुद का जीवन
चलती रही पर पथ अनजाना
बस गुमनामी में खो जाना
कभी आई थी सीता बनकर
पछताई मृगेच्छा कर कर
लांघी क्या इक सीमा मैने
हर युग में मिले मुझको ताने
राधा बनकर मैं ही रोई
भटकी वन वन खोई खोई
कभी पांचाली बनकर रोई
पतियों ने मर्यादा खोई
दांव पे मुझको लगा दिया
अपना छोटापन दिखा दिया
मैं रोती रही चिल्लाती रही
पतिव्रता स्वयं को बताती रही
भरी सभा में बैठे पांच पति
की गई मेरी ऐसी दुर्गति
नहीं किसी का पुरुषत्व जागा
बस मुझ पर ही कलंक लागा
फिर बन आई झांसी रानी
नारी से बन गई मर्दानी
अब गीत मेरे सब गाते हैं
किस्से लिख-लिख के सुनाते हैं
मैने तो उठा लिया बीडा
पर नहीं दिखी मेरी पीडा
न देखा मैनें स्व यौवन
विधवापन में खोया बचपन
न माँ बनी मै माँ बनकर
सोई कांटों की सेज़ जाकर
हर युग ने मुझको तरसाया
भावना ने मुझे मेरी बहकाया
कभी कटु कभी मैं बेचारी
हर युग में मै भटकी नारी