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Wednesday, 2 August 2017

मैं प्रेम में था...!!

मैं प्रेम में था और उसे बांधने की कोशिश करने लगा ,मैं उसे जितना खुद से बांध कर रखना चाहता वो मुझसे उतना ही दूर होता चला गया ..... ये मेरी ,उसकी नहीं अधिकतर प्रेम को जीने वाले जोड़ों की कहानी है जब हम प्रेम में होते हैं तो अपने प्रेमी /प्रेमिका को कैद करने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन उसका प्रतिफल ये होता है कि सामने वाला इंसान हमसे दूर जाने लगता है या बहुत सारी बातों को छुपाने लगता है ,प्रेम मुक्ति का दूसरा नाम है अगर आप प्रेम को जीना चाहते हैं और प्रेम पाना चाहते हैं आज़ाद कर दीजिये अपने जीवनसाथी को ,बार -बार शक करना छोड़ कर उन्हें करने दीजिये हर वो काम जिनमें वे खुश हैं ,उन पर भरोसा करिये क्योंकि प्रेम और भरोसा साथ -साथ चलते हैं अगर भरोसा नहीं है तो प्रेम भी निश्चित तौर पर नहीं है ,,एक बार आज़ाद करके,भरोसा करके देखिये आप का प्रेम और भी गहरा होगा और निश्चित तौर पर आपके प्रेम की आयु औसत से कहीं ज्यादा होगी।।
~~®®®~~

Saturday, 15 February 2014

"कभी - कभी ये ख्याल आता है "

मुझे कभी - कभी ये ख्याल आता है ,
की शायद कोई है जिसे मुझपर भी प्यार आता है,
मेरा हर ग़म उस को लगता है अपना,
और मेरी हर ख़ुशी पे उस को करार आता है,
फिर जाने क्यूँ वो कहने से डरती है,
ऐसा जाने क्या उस के मन में ख्याल आता है,
आँखों से अक्सर इकरार करती है,
क्यूँ होंठों पर हर बार इनकार आता है,
सोचता हूँ मैं ही कह दूं वो जो कह न सकी,
लेकिन फिर न सुन कर बिछरने का ख्याल आता है,
चलो अच्छा है हँसते हँसते ही हम चले जायेंगे,
की शायद कोई है जिसे मुझपर भी प्यार आता है ...

Friday, 14 February 2014

निरंतर चलता हैं प्रेम...

नहीं रुकता प्रेम
कभी भी
नहीं …
कभी थमता भी नहीं
कि बिना संवाद के भी
जारी है
निरंतर संवाद !
मौन की भाषा
पढ़ती हैं आँखें
मौन के संवाद
बोलती हैं आँखें
और सुनता है ह्रदय
मौन की गूँज को
कि नहीं रुकता प्रेम
कभी भी
नहीं…
कभी थमता भी नहीं ….!

Saturday, 15 May 2010

ऐ मेरे प्यार.......

पता नहीं कौन हो तुम मेरी 
किस जन्म का है ये बन्धन 
क्यों मिलती हो मुझसे 
क्यों फिर चली जाती हो 
क्यों मुझे सिर्फ़ तुम 
सिर्फ़ तुम याद आती हो.. 
मैं तुम्हारे दीवानों में 
एक अदना सा दीवाना हूँ........ 

चाँद जैसा आवारा नहीं 
जो रातों मैं तुम्हरे घर 
के चक्कर लगाऊ, 
पवन जैसा बेशरम भी नहीं 
जो तुम्हरे तन को स्पर्श करता 
हुआ चला जाऊं, 
समंदर भी नहीं, जिससे करती 
होगी तुम बातें, 
उन सितारों मैं से कोई भी 
सितारा नहीं 
जिन्हें गिनती होगी तुम 
सारी सारी रातें, 
वो फूल नहीं, जिसकी पेंखुरी 
तोड़ तोड़ कर गिराती होगी तुम, 
जब कभी मेरे बारे मैं सोंचते हुए 
अपने घर के चक्कर लगाती होगी तुम, 
मुझसे कहीं अच्छा है तुम्हारा 
वो दुपट्टा जो छोड़ता न होगा तुम्हे , 
चाहे करती होगी कितने यतन 
और वो तुम्हरे हाथों के कंगन 
तुम्हे स्वप्न से उठाते होंगे 
जब कभी सोते हुए तुम्हारे 
हाथ आपस मैं लड़ जाते होंगे 
वो दर्पण तुम्हे रोज़ ही देखता होगा 
जब करती होगी तुम श्रृंगार 
पर मैं तुम्हे शायद ही देख पाऊँ इस 
जीवन मैं ऐ मेरे प्यार........ 

धरती भी कभी आसमा से मिल नहीं पाती 
पर क्षितिज इन दोनों को मिलाता है, 
समंदर भी दो किनारों को पास लाता है 
अब देखना है की वो मेरा इश्वर 
मुझे तुमसे मिलवाता है 
या यूँ ही एक गरीब को विरह 
की आग मैं जलाता है... ।

Monday, 1 March 2010

मजबूर


क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए,
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए...

ऐसा नहीं कि हमको कोई भी खुशी नहीं,
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं,
क्यों इसके फ़ैसले हमें मंज़ूर हो गए.
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए...

पाया तुम्हें तो हमको लगा तुमको खो दिया,
हम दिल पे रोए और ये दिल हम पे रो दिया,
पलकों से ख़्वाब क्यों गिरे क्यों चूर हो गए.
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए...

Friday, 15 May 2009

मेरा नाम


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एक दिन मैं
उसके घर के सामने से निकला,
घर के बाहर कागजों के
कुछ चीथडे पड़े हुए थे...

मुझे उम्मीद थी की वो
मेरे ख़त के टुकडे होंगे..
मैंने उन्हें उठाया,
घर लाया
फिर करीने से लगाया…
तब पाया......

की वो एक कागज़ था
जिस पर कई बार मेरा नाम लिखा हुआ था................."