Showing posts with label प्यार. Show all posts
Showing posts with label प्यार. Show all posts

Wednesday, 2 August 2017

मैं प्रेम में था...!!

मैं प्रेम में था और उसे बांधने की कोशिश करने लगा ,मैं उसे जितना खुद से बांध कर रखना चाहता वो मुझसे उतना ही दूर होता चला गया ..... ये मेरी ,उसकी नहीं अधिकतर प्रेम को जीने वाले जोड़ों की कहानी है जब हम प्रेम में होते हैं तो अपने प्रेमी /प्रेमिका को कैद करने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन उसका प्रतिफल ये होता है कि सामने वाला इंसान हमसे दूर जाने लगता है या बहुत सारी बातों को छुपाने लगता है ,प्रेम मुक्ति का दूसरा नाम है अगर आप प्रेम को जीना चाहते हैं और प्रेम पाना चाहते हैं आज़ाद कर दीजिये अपने जीवनसाथी को ,बार -बार शक करना छोड़ कर उन्हें करने दीजिये हर वो काम जिनमें वे खुश हैं ,उन पर भरोसा करिये क्योंकि प्रेम और भरोसा साथ -साथ चलते हैं अगर भरोसा नहीं है तो प्रेम भी निश्चित तौर पर नहीं है ,,एक बार आज़ाद करके,भरोसा करके देखिये आप का प्रेम और भी गहरा होगा और निश्चित तौर पर आपके प्रेम की आयु औसत से कहीं ज्यादा होगी।।
~~®®®~~

Saturday, 14 December 2013

ज़िन्दगी के खेल

ज़िन्दगी के खेल भी अजीब हैं
एक अजनबी को दिल के करीब ला दिया
कल तक जिसका नाम भी जेहन में न था
आज खुदा ने उससे हमारी तकदीर बना दिया
कुछ पल के साथ में ही
वो अपना सा लगने लगा
खुद से थे अनजान अब तक
वो हमे हमी से ज्यादा समझने लगा
कल तक तो ख्वाब में था चेहरा
वो हकीक़त बन सामने आ गया
हो गए हम ख़ास आज किसी के लिए
हमे मिटटी से सोना बना दिया
बस एक गुजारिश है खुदा से अब
के साथ उनका नसीब हो ज़िन्दगी भर
मेरे प्यार पर हो बस उनका ही हक
ये आंखे भी बंद हो तो उनका चेहरा देखकर....

Saturday, 15 May 2010

ऐ मेरे प्यार.......

पता नहीं कौन हो तुम मेरी 
किस जन्म का है ये बन्धन 
क्यों मिलती हो मुझसे 
क्यों फिर चली जाती हो 
क्यों मुझे सिर्फ़ तुम 
सिर्फ़ तुम याद आती हो.. 
मैं तुम्हारे दीवानों में 
एक अदना सा दीवाना हूँ........ 

चाँद जैसा आवारा नहीं 
जो रातों मैं तुम्हरे घर 
के चक्कर लगाऊ, 
पवन जैसा बेशरम भी नहीं 
जो तुम्हरे तन को स्पर्श करता 
हुआ चला जाऊं, 
समंदर भी नहीं, जिससे करती 
होगी तुम बातें, 
उन सितारों मैं से कोई भी 
सितारा नहीं 
जिन्हें गिनती होगी तुम 
सारी सारी रातें, 
वो फूल नहीं, जिसकी पेंखुरी 
तोड़ तोड़ कर गिराती होगी तुम, 
जब कभी मेरे बारे मैं सोंचते हुए 
अपने घर के चक्कर लगाती होगी तुम, 
मुझसे कहीं अच्छा है तुम्हारा 
वो दुपट्टा जो छोड़ता न होगा तुम्हे , 
चाहे करती होगी कितने यतन 
और वो तुम्हरे हाथों के कंगन 
तुम्हे स्वप्न से उठाते होंगे 
जब कभी सोते हुए तुम्हारे 
हाथ आपस मैं लड़ जाते होंगे 
वो दर्पण तुम्हे रोज़ ही देखता होगा 
जब करती होगी तुम श्रृंगार 
पर मैं तुम्हे शायद ही देख पाऊँ इस 
जीवन मैं ऐ मेरे प्यार........ 

धरती भी कभी आसमा से मिल नहीं पाती 
पर क्षितिज इन दोनों को मिलाता है, 
समंदर भी दो किनारों को पास लाता है 
अब देखना है की वो मेरा इश्वर 
मुझे तुमसे मिलवाता है 
या यूँ ही एक गरीब को विरह 
की आग मैं जलाता है... ।