Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Sunday, 1 March 2015

बहुत दूर, बहुत दूर


तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला,
मैं बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर चला.

इस क़दर दूर हूँ मैं लौट के भी आ न सकूँ,
ऐसी मंज़िल कि जहाँ खुद को भी मैं पा न सकूँ,
और मजबूरी है क्या इतना भी बतला न सकूँ.

आँख भर आयी अगर अश्क़ों को मैं पी लूँगा,
आह निकली जो कभी होंठों को मैं सी लूँगा,
तुझसे वादा है किया इस लिये मैं जी लूँगा.

खुश रहे तू है जहां ले जा दुआएं मेरी,
तेरी राहों से जुदा हो गयी राहें मेरी,
कुछ नहीं पास मेरे बस हैं खताएं मेरी.

तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला,
मैं बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर चला...

Wednesday, 16 April 2014

ना तुम बेवफा हो, ना हम बेवफा हैं...


                                                  ना तुम बेवफा हो, ना हम बेवफा हैं,
                                                  मगर क्या करें, अपनी राहें जुदा हैं.

                                                  जहाँ ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही है,
                                                  किसी की मुहब्बत वहाँ जल रही है,
                                                  ज़मीं आसमां हमसे दोनों खफा हैं.
                                                  ना तुम बेवफा हो, ना हम बेवफा हैं...

                                                  अभी कल तलक तो मुहब्बत जवां थी,
                                                  मिलन ही मिलन था, जुदाई कहाँ थी,
                                                  मगर आज दोनों ही बे-आसरा हैं.
                                                  ना तुम बेवफा हो, ना हम बेवफा हैं...

                                                  ज़माना कहे मेरी राहों में आजा,
                                                  मुहब्बत कहे मेरी बाहों में आजा,
                                                  वो समझे ना मजबूरियाँ अपनी क्या है.

                                                  ना तुम बेवफा हो, ना हम बेवफा हैं...
                                                                                          " लता मेम" आपको समर्पित ……

Saturday, 14 December 2013

ज़िन्दगी के खेल

ज़िन्दगी के खेल भी अजीब हैं
एक अजनबी को दिल के करीब ला दिया
कल तक जिसका नाम भी जेहन में न था
आज खुदा ने उससे हमारी तकदीर बना दिया
कुछ पल के साथ में ही
वो अपना सा लगने लगा
खुद से थे अनजान अब तक
वो हमे हमी से ज्यादा समझने लगा
कल तक तो ख्वाब में था चेहरा
वो हकीक़त बन सामने आ गया
हो गए हम ख़ास आज किसी के लिए
हमे मिटटी से सोना बना दिया
बस एक गुजारिश है खुदा से अब
के साथ उनका नसीब हो ज़िन्दगी भर
मेरे प्यार पर हो बस उनका ही हक
ये आंखे भी बंद हो तो उनका चेहरा देखकर....

Sunday, 17 March 2013

इतने अनजान क्यो हो………





न जाने क्यों में तुमसे इतना प्यार करती हुँ
तुमसे हरवक्त मिलने का इंतजार करती हुँ
मेरी चाहतो पर क्यों इतना अनजान हो
झील सी गहरी इन आंखों में कुछ सपने लिए
में तुमसे मिलने का इंतजार करती हुँ
हर आहट पर हमे लगे की वो आ गए
न जाने कब आप हमारे दिल में समा गए
देखते ही देखते आप मेरे इस दिल में
अपनी एक बहुत ही खास जगह बना गए
अहसास अपने प्यार का मुझको दिला गए
मोहब्बत की दुनिया में मुझको भी डुबा गए
न जाने क्या बात है आपको चाहने में
मुझे जैसे पत्थर को मोम जैसा बना गए……

मेरे प्यारे दोस्त तुम्हारे लिये…~~®®®~~


Tuesday, 6 March 2012

ये खाली पन्ने


में नहीं जानता कि, में क्यों लिखता हूँ,
बस, ये खाली पन्ने यूँ देखे नहीं जाते,
इनसे ही अपना अकेलापन बाट लेता हूँ..

मेरे ख़यालो का आइना हैं ये,
मेरी अनकही बातें, मेरे अनसुने जज़्बात हैं ये..
इन पर जो स्याही है,
मेरे सपनो, मेरे छुपे आंसू, मेरे दर्द, मेरे प्यार कि हैं..

इन पर में पूरी तरह आज़ाद हूँ,
इन पर न कोई रोक है, न कोई टोक..

कभी भर देता हूँ इन्हे, दिए कि लौ से,
कभी बारिश कि बूंदो से,
कभी बचपन कि यादों से,
कभी उस हसींन कि तारीफों से..

ये पन्ने कुछ जवाब नहीं देते,
बस सुन लेते हैं मेरी बात,
क़ैद कर लेते हैं खुद में,
"मेरी दुनिया, मेरे जज़्बात"

किसी से कहते नहीं, किसी को बताते नहीं,
बस सम्भाल कर रखते हैं मेरी अमानत को,
मेरी कहानियों को, मेरी रवानियों को,
मेरी बातों को..

ये सही-गलत का भेद नहीं करते,
न अच्छे का, न बुरे का
इन पर न कुछ झूठ है, न सच..

कुछ यादें लेकर बिखर चुके हैं ये,
कुछ यादें अब भी संजोये हैं,
कुछ कहानिया और बाकी हैं मेरी,
जो इनमे मिल जाएँगी, और यादें बन जाएँगी..

कुछ किस्से और बाकी हैं मेरे,
जो मेरे जाने के बाद भी रहेंगे,
जो कभी खो जायेंगे, कभी मिल जायेंगे,
किसी को, कभी मेरी याद दिलाएंगे..

के था एक नादान लिखने वाला,
जो दुनियांदारी छोड़ कर,
इन पन्नों के प्यार में पढ़ गया..

इन्ही पन्नो में उसकी हमसफ़र कि बातें थी,
इन्ही पन्नो में उसके यारो के क़िस्से,
इन्ही पन्नो में वो आज़ाद रहा,
इन्ही पन्नो में वो क़ैद,
इन्ही पन्नो पर रोशन हुआ,
और फिर इन्ही पन्नो में डूब गया..

Friday, 11 March 2011

कोई हम से पूछे


किसी अजनबी को दिल में बसाना क्या है
कोई हम से पूछे
उसकी यादों में ख़ुद को भुलाना क्या है
कोई हम से पूछे
दिल फ़िर टूट के बिखर गया तो क्या
उन टुकडो को चुन कर नए अरमान बनाना क्या है
कोई हम से पूछे

किसी के दूर होकर भी पास होना क्या है
कोई हम से पूछे
न उम्मीद होकर भी इंतज़ार करना क्या है
कोई हम से पूछे
दिल की बाज़ी हार गए तो क्या
अपना सब कुछ खोकर भी मुस्कुराना क्या है
कोई हम से पूछे

होठो को सिल कर सब कुछ सहना क्या है
कोई हम से पूछे
अपने अश्कों को पी कर दुसरो को हँसाना क्या है
कोई हम से पूछे
खुदा से गिला करे भी तो क्या
उसकी हर रजा में सर को झुकाना क्या है
कोई हम से पूछे

Saturday, 15 May 2010

ऐ मेरे प्यार.......

पता नहीं कौन हो तुम मेरी 
किस जन्म का है ये बन्धन 
क्यों मिलती हो मुझसे 
क्यों फिर चली जाती हो 
क्यों मुझे सिर्फ़ तुम 
सिर्फ़ तुम याद आती हो.. 
मैं तुम्हारे दीवानों में 
एक अदना सा दीवाना हूँ........ 

चाँद जैसा आवारा नहीं 
जो रातों मैं तुम्हरे घर 
के चक्कर लगाऊ, 
पवन जैसा बेशरम भी नहीं 
जो तुम्हरे तन को स्पर्श करता 
हुआ चला जाऊं, 
समंदर भी नहीं, जिससे करती 
होगी तुम बातें, 
उन सितारों मैं से कोई भी 
सितारा नहीं 
जिन्हें गिनती होगी तुम 
सारी सारी रातें, 
वो फूल नहीं, जिसकी पेंखुरी 
तोड़ तोड़ कर गिराती होगी तुम, 
जब कभी मेरे बारे मैं सोंचते हुए 
अपने घर के चक्कर लगाती होगी तुम, 
मुझसे कहीं अच्छा है तुम्हारा 
वो दुपट्टा जो छोड़ता न होगा तुम्हे , 
चाहे करती होगी कितने यतन 
और वो तुम्हरे हाथों के कंगन 
तुम्हे स्वप्न से उठाते होंगे 
जब कभी सोते हुए तुम्हारे 
हाथ आपस मैं लड़ जाते होंगे 
वो दर्पण तुम्हे रोज़ ही देखता होगा 
जब करती होगी तुम श्रृंगार 
पर मैं तुम्हे शायद ही देख पाऊँ इस 
जीवन मैं ऐ मेरे प्यार........ 

धरती भी कभी आसमा से मिल नहीं पाती 
पर क्षितिज इन दोनों को मिलाता है, 
समंदर भी दो किनारों को पास लाता है 
अब देखना है की वो मेरा इश्वर 
मुझे तुमसे मिलवाता है 
या यूँ ही एक गरीब को विरह 
की आग मैं जलाता है... ।

Monday, 1 March 2010

मजबूर


क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए,
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए...

ऐसा नहीं कि हमको कोई भी खुशी नहीं,
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं,
क्यों इसके फ़ैसले हमें मंज़ूर हो गए.
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए...

पाया तुम्हें तो हमको लगा तुमको खो दिया,
हम दिल पे रोए और ये दिल हम पे रो दिया,
पलकों से ख़्वाब क्यों गिरे क्यों चूर हो गए.
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए...

Friday, 15 May 2009

मेरा नाम


3773268383_cf20de5c50
एक दिन मैं
उसके घर के सामने से निकला,
घर के बाहर कागजों के
कुछ चीथडे पड़े हुए थे...

मुझे उम्मीद थी की वो
मेरे ख़त के टुकडे होंगे..
मैंने उन्हें उठाया,
घर लाया
फिर करीने से लगाया…
तब पाया......

की वो एक कागज़ था
जिस पर कई बार मेरा नाम लिखा हुआ था................."