Tuesday, 6 March 2012

ये खाली पन्ने


में नहीं जानता कि, में क्यों लिखता हूँ,
बस, ये खाली पन्ने यूँ देखे नहीं जाते,
इनसे ही अपना अकेलापन बाट लेता हूँ..

मेरे ख़यालो का आइना हैं ये,
मेरी अनकही बातें, मेरे अनसुने जज़्बात हैं ये..
इन पर जो स्याही है,
मेरे सपनो, मेरे छुपे आंसू, मेरे दर्द, मेरे प्यार कि हैं..

इन पर में पूरी तरह आज़ाद हूँ,
इन पर न कोई रोक है, न कोई टोक..

कभी भर देता हूँ इन्हे, दिए कि लौ से,
कभी बारिश कि बूंदो से,
कभी बचपन कि यादों से,
कभी उस हसींन कि तारीफों से..

ये पन्ने कुछ जवाब नहीं देते,
बस सुन लेते हैं मेरी बात,
क़ैद कर लेते हैं खुद में,
"मेरी दुनिया, मेरे जज़्बात"

किसी से कहते नहीं, किसी को बताते नहीं,
बस सम्भाल कर रखते हैं मेरी अमानत को,
मेरी कहानियों को, मेरी रवानियों को,
मेरी बातों को..

ये सही-गलत का भेद नहीं करते,
न अच्छे का, न बुरे का
इन पर न कुछ झूठ है, न सच..

कुछ यादें लेकर बिखर चुके हैं ये,
कुछ यादें अब भी संजोये हैं,
कुछ कहानिया और बाकी हैं मेरी,
जो इनमे मिल जाएँगी, और यादें बन जाएँगी..

कुछ किस्से और बाकी हैं मेरे,
जो मेरे जाने के बाद भी रहेंगे,
जो कभी खो जायेंगे, कभी मिल जायेंगे,
किसी को, कभी मेरी याद दिलाएंगे..

के था एक नादान लिखने वाला,
जो दुनियांदारी छोड़ कर,
इन पन्नों के प्यार में पढ़ गया..

इन्ही पन्नो में उसकी हमसफ़र कि बातें थी,
इन्ही पन्नो में उसके यारो के क़िस्से,
इन्ही पन्नो में वो आज़ाद रहा,
इन्ही पन्नो में वो क़ैद,
इन्ही पन्नो पर रोशन हुआ,
और फिर इन्ही पन्नो में डूब गया..

Sunday, 4 March 2012

क्या हम सब ढ़ोंगी हैं ?


आजकल इस सोशियल मीडीया के दौर मे एक आम सहमति बनाना बहुत मुश्किल है. सभी की आपनी एक सोच है और होनी भी चाहिए. शायद यही एक लोकतांत्रिक देश मे रहने का फ़ायदा है, जिससे आज भी दुनिया के कई मुल्क बहुत दूर है.

YouTube के काफ़ी प्रचलित हो जाने के कारण से आज देश का हर दूसरा लड़का रात-तो-रात वाइरल होना चाहता है. सोशियल एक्सपेरिमेंट्स और सवाल जबाब संबंधित वीडियोस की झड़ी लग चुकी है.

सभी के आपने अलग इश्यूस है. कोई भारतीय संस्कृति से परेशन है, कोई महिलाओ के हित के लिए लड़ रहा है और कोई चाहता है की भारत युरोप एवं अमेरिका जैसी ओपन सोसाइटी बन जाए. ठीक है में ऐसा नही कह रहा की एक ओपन सोसाइटी होना ग़लत है पर असली सवाल तो यह है की क्या हम खुद तय्यार है? क्या हम उन सभी मापदंडो पर खरे उतर सकेंगे?

भारतीय YouTube चॅनेल्स पर पूछे गए कुछ सवाल और उनके दिया गये जवाब(बहुमत). साथ मे मेरी आपनी निजी राय और कुछ सवाल.

सवाल: क्या भारत मे वैश्यावृति को क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी दे देनी चाहिए?

बहुमत: हां.. वैश्यावृति को क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी देने से बलात्कार जैसे अपराधो मे कमी आएगी. जो भी डेस्परेट लोग है वो बलात्कार करने के बजाए वैश्याओ के पास जा कर अपनी हवस बुझा लेंगे. वैश्यावृति भी एक प्रोफेशन है, जैसे सभी को पैसे कमाने का हक़ है वैसे ही उनको भी पूरा हक़ है. ये वैसे भी हो ही रहा है, तो क्यू ना क़ानूनी तौर पर हो. I think its kind of progressive to have this in India since our country is developing.

मेरी राय: इसमे दो मत नहीं की सेक्स संबंधी अपराधो को रोकना हमारी प्राथमिकता है, पर क्या वैश्यावृति ही एक साधन है. To be a prostitute is nobodies childhood dream, circumstances make them. क्या किसी को आपने वैश्या होने पर गर्व हो सकता है? मेरे ख़याल से तो नही. बलात्कार वहाँ भी हो रहे है जहाँ वैश्यावृति की मंज़ूरी है. मेरी समझ मे इन अपराधो को रोकने का एक ही तरीका है और वो है क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त करना.

मेरा सवाल: चलो एक बार हम मान लेते है की इसे मंज़ूरी मिल जाती है. तो क्या अगर कभी आपका छोटा भाई या बेटा (बालिग) डेस्परेट हो गया तो क्या आप उसे एक वैश्या के पास जाने की इजाज़त दे देंगे. अगर आप को कहीं से यह पता लगा की आप का भाई या फिर बेटा अपनी संतुष्टि और डेस्परेशन कम करने के लिए ऐसा करता है तो क्या आप उसे तुरंत माफ़ कर देंगे? हर बलात्कारी किसी का भाई और किसी का बेटा होता है.

Monday, 9 January 2012

भारतीय युवा

भारत की कुल आबादी  में  युवाओं की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत है जो कि विश्व के अन्य देशों के मुकाबले काफी है। इस युवा शक्ति का सम्पूर्ण दोहन सुनिश्चित करने की चुनौती इस समय सबसे बड़ी है। जब तक यह ऊर्जा और आन्दोलन सकारात्मक रूप में है तब तक तो ठीक है, पर ज्यों ही इसका नकारात्मक रूप में इस्तेमाल होने लगता है वह विध्वंसात्मक बन जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन कारणों से युवा ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है ? वस्तुत: इसके पीछे जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हटना है, वहीं दूसरी तरफ हमारी शिक्षा व्यवस्था का भी दोष है। इन सब के बीच आज का युवा अपने को असुरक्षित महसूस करता है, फलस्वरूप वह शार्टकट तरीकों से लम्बी दूरी की दौड़ लगाना चाहता है। जीवन के सारे मूल्यों के ऊपर उसे ‘अर्थ’ भारी नजर आता है। इसके अलावा समाज में नायकों के बदलते प्रतिमान ने भी युवाओं के भटकाव में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्मी परदे और अपराध की दुनिया  के नायकों की भाँति वह रातों-रात  उस शोहरत और मंजिल को पा लेना चाहता है, जो सिर्फ एक मृगतृष्णा है। युवा शब्द अपने आप में ही ऊर्जा और आन्दोलन का प्रतीक है। युवा को किसी राष्ट्र की  नींव तो नहीं कहा जा सकता पर यह वह दीवार अवश्य है जिस पर राष्ट्र की भावी छतों को सम्हालने का दायित्व है। वे किसी भी समाज और राष्ट्र के कर्णधार हैं, वे उसके भावी निर्माता हैं। चाहे वह नेता या शासक के रूप में हों, चाहे डाक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कलाकार के रूप में हों। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का गहरा दायित्व होता है। पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परम्परागत विरासतों का वाहक बनने से इन्कार कर दे तो निश्चितत: किसी भी राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है

Tuesday, 20 September 2011

उम्र

एक दिन सम्राट अकबर ने दरबार में अपने मंत्रियों से पूछा कि मनुष्य में काम-वासना कब तक रहती है। कुछ ने कहा ३० वर्ष तक, कुछ ने कहा ६० वर्ष तक। 
बीरबल ने उत्तर दिया – “मरते दम तक”।
अकबर को इस पर यकीन नहीं आया। वह बीरबल से बोला – मैं इसे नहीं मानता। तुम्हें यह सिद्ध करना होगा की इंसान में काम-वासना मरते दम तक रहती है”।
बीरबल ने अकबर से कहा कि वे समय आने पर अपनी बात को सही साबित करके दिखा देंगे।
एक दिन बीरबल सम्राट के पास भागे-भागे आए और कहा – “आप इसी वक़्त राजकुमारी को साथ लेकर मेरे साथ चलें”।
अकबर जानते थे कि बीरबल की हर बात में कुछ प्रयोजन रहता था। वे उसी समय अपनी बेहद खूबसूरत युवा राजकुमारी को अपने साथ लेकर बीरबल के पीछे चल दिए।
बीरबल उन दोनों को एक व्यक्ति के घर ले गया। वह व्यक्ति बहुत बीमार था और बिल्कुल मरने ही वाला था।
बीरबल ने सम्राट से कहा – “आप इस व्यक्ति के पास खड़े हो जायें और इसके चेहरे को गौर से देखते रहें”।
इसके बाद बीरबल ने राजकुमारी को कमरे में बुलाया। मरणासन्न व्यक्ति ने राजकुमारी को इस दृष्टि से देखा कि अकबर के समझ में सब कुछ आ गया।
बाद में अकबर ने बीरबल से कहा – “तुम सही कहते थे। मरते-मरते भी एक सुंदर जवान लडकी के चेहरे की एक झलक आदमी के भीतर हलचल मचा देती है”।

Sunday, 15 May 2011

.....जूझने के लिये तैयार हैं आप ?

सामान्य तौर पर 38 डिग्री से अधिक तापमान होने पर शरीर को परेशानी होने लगती है और इस समय तापमान 42 डिग्री से अधिक है । कल राजधानी में 42.6 डिग्री का पारा था जो कि शरीर के लिये खतरनाक है । तेज धूप के कारण सीधे दिमाग पर असर होता है जिससे बेचैनी का अहसास होता है और दिमाग किसी भी कार्य को लेकर केन्द्रित नहीं हो पाता है ।
सूर्य की किरणों में उपस्थित अल्ट्रा वायलेट किरणें शरीर के लिये नुकसानदायक " रिएक्टिव ऑक्सीज़न स्पेसीज़ " नामक कणों का उत्पादन बढ़ा देती हैं ( जो कि स्किन कैंसर का एक प्रमुख कारण है ) परन्तु तरबूज ( कहीं-कहीं इसे 'हिरमाना' भी कहा जाता है) में पाये जाने वाला ' लाइकोपिन ' नामक तत्व उन्हें बेअसर कर देता है । वस्तुतः लाइकोपिन एक ' एंटी ऑक्सीडेंट ' है जो कि हमारे शरीर के अन्दर मौज़ूद ' फ्री रैडिकल्स ' को निष्क्रिय बनाने का कार्य करता है । तरबूज में विटामिन 'ए' और 'सी' भी भरपूर मात्रा में होते हैं । शायद इसीलिए प्रकृति ने इसे गर्मी के मौसम में हमें प्रदान किया है ।
गर्मी में लगातार पसीना निकलता रहता है , अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है ( गर्मी में , जाड़े की तुलना में शरीर को काम करने के लिए डेढ़ गुना ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है ) लोग इतना थक सकते है कि साँस लेने में भी दम लगाना पड़ता है , अब ऐसे में यदि आप भोजन में पोषण तत्वों की कमी कर बैठे तो आप को लगेगा कि आप दमा ( अस्थमा ) के मरीज़ तो नहीं ? पोटेशियम और सोडियम की कमी से धूप में चक्कर खा कर गिर भी सकते हैं । तीखी गर्मी में शरीर का पानी सूखने पर उल्टी-दस्त शुरु हो सकता है अतएव खाली पेट धूप में न निकलें , भोजन कम तथा पानी अधिक पीयें । नींबू-पानी-नमक एवं चीनी के घोल का सेवन करें । धूप और गर्म हवाओं का सामना करना अगर आपकी मज़बूरी है तो शरीर को गर्मी से जूझने के लिए तैयार कर लीजिये ! वैसे मौसम विभाग की मानें तो " लू " के थपेड़े अभी शुरु नहीं हुए हैं फिरभी लोग बदहाल हैं । अब मई में गर्मी का यह हाल है तो जून में क्या होगा ?

Wednesday, 6 April 2011

अब जीने दो मुझे……



मैं थक गया हूँ न दे तू और ग़म नया मेरे हालात पे अब तो छोड़ दे मुझको

मैं अपने वहम में सुकून से जी लेता हूँ न तोड़ उनको अभी और जी लेने दे मुझको

रुसवाइयों का दौर कुछ रहा है बाक़ी ख़ाक बनकर सरेआम बिखरने दे मुझको

मैं तेरी नजरो में न फिर से कभी आऊंगा मेरे ख्यालों की दुनिया बसाने दे मुझको

तू अपनी दुनिया का नूर बनके यूं चमके दूर सहरा से नज़र आए आफ़ताब मुझको

साथ जितना भी दिया तूने बस वो ही काफी था अफसाना-ऐ-दर्द अब तो गुनगुनाने दे मुझको

Friday, 11 March 2011

कोई हम से पूछे


किसी अजनबी को दिल में बसाना क्या है
कोई हम से पूछे
उसकी यादों में ख़ुद को भुलाना क्या है
कोई हम से पूछे
दिल फ़िर टूट के बिखर गया तो क्या
उन टुकडो को चुन कर नए अरमान बनाना क्या है
कोई हम से पूछे

किसी के दूर होकर भी पास होना क्या है
कोई हम से पूछे
न उम्मीद होकर भी इंतज़ार करना क्या है
कोई हम से पूछे
दिल की बाज़ी हार गए तो क्या
अपना सब कुछ खोकर भी मुस्कुराना क्या है
कोई हम से पूछे

होठो को सिल कर सब कुछ सहना क्या है
कोई हम से पूछे
अपने अश्कों को पी कर दुसरो को हँसाना क्या है
कोई हम से पूछे
खुदा से गिला करे भी तो क्या
उसकी हर रजा में सर को झुकाना क्या है
कोई हम से पूछे