Monday, 9 January 2012

भारतीय युवा

भारत की कुल आबादी  में  युवाओं की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत है जो कि विश्व के अन्य देशों के मुकाबले काफी है। इस युवा शक्ति का सम्पूर्ण दोहन सुनिश्चित करने की चुनौती इस समय सबसे बड़ी है। जब तक यह ऊर्जा और आन्दोलन सकारात्मक रूप में है तब तक तो ठीक है, पर ज्यों ही इसका नकारात्मक रूप में इस्तेमाल होने लगता है वह विध्वंसात्मक बन जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन कारणों से युवा ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है ? वस्तुत: इसके पीछे जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हटना है, वहीं दूसरी तरफ हमारी शिक्षा व्यवस्था का भी दोष है। इन सब के बीच आज का युवा अपने को असुरक्षित महसूस करता है, फलस्वरूप वह शार्टकट तरीकों से लम्बी दूरी की दौड़ लगाना चाहता है। जीवन के सारे मूल्यों के ऊपर उसेअर्थभारी नजर आता है। इसके अलावा समाज में नायकों के बदलते प्रतिमान ने भी युवाओं के भटकाव में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्मी परदे और अपराध की दुनिया  के नायकों की भाँति वह रातों-रात  उस शोहरत और मंजिल को पा लेना चाहता है, जो सिर्फ एक मृगतृष्णा है। युवा शब्द अपने आप में ही ऊर्जा और आन्दोलन का प्रतीक है। युवा को किसी राष्ट्र की  नींव तो नहीं कहा जा सकता पर यह वह दीवार अवश्य है जिस पर राष्ट्र की भावी छतों को सम्हालने का दायित्व है। वे किसी भी समाज और राष्ट्र के कर्णधार हैं, वे उसके भावी निर्माता हैं। चाहे वह नेता या शासक के रूप में हों, चाहे डाक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कलाकार के रूप में हों। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का गहरा दायित्व होता है। पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परम्परागत विरासतों का वाहक बनने से इन्कार कर दे तो निश्चितत: किसी भी राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है

Tuesday, 20 September 2011

उम्र

एक दिन सम्राट अकबर ने दरबार में अपने मंत्रियों से पूछा कि मनुष्य में काम-वासना कब तक रहती है। कुछ ने कहा ३० वर्ष तक, कुछ ने कहा ६० वर्ष तक। 
बीरबल ने उत्तर दिया – “मरते दम तक”।
अकबर को इस पर यकीन नहीं आया। वह बीरबल से बोला – मैं इसे नहीं मानता। तुम्हें यह सिद्ध करना होगा की इंसान में काम-वासना मरते दम तक रहती है”।
बीरबल ने अकबर से कहा कि वे समय आने पर अपनी बात को सही साबित करके दिखा देंगे।
एक दिन बीरबल सम्राट के पास भागे-भागे आए और कहा – “आप इसी वक़्त राजकुमारी को साथ लेकर मेरे साथ चलें”।
अकबर जानते थे कि बीरबल की हर बात में कुछ प्रयोजन रहता था। वे उसी समय अपनी बेहद खूबसूरत युवा राजकुमारी को अपने साथ लेकर बीरबल के पीछे चल दिए।
बीरबल उन दोनों को एक व्यक्ति के घर ले गया। वह व्यक्ति बहुत बीमार था और बिल्कुल मरने ही वाला था।
बीरबल ने सम्राट से कहा – “आप इस व्यक्ति के पास खड़े हो जायें और इसके चेहरे को गौर से देखते रहें”।
इसके बाद बीरबल ने राजकुमारी को कमरे में बुलाया। मरणासन्न व्यक्ति ने राजकुमारी को इस दृष्टि से देखा कि अकबर के समझ में सब कुछ आ गया।
बाद में अकबर ने बीरबल से कहा – “तुम सही कहते थे। मरते-मरते भी एक सुंदर जवान लडकी के चेहरे की एक झलक आदमी के भीतर हलचल मचा देती है”।

Sunday, 15 May 2011

.....जूझने के लिये तैयार हैं आप ?

सामान्य तौर पर 38 डिग्री से अधिक तापमान होने पर शरीर को परेशानी होने लगती है और इस समय तापमान 42 डिग्री से अधिक है कल राजधानी में 42.6 डिग्री का पारा था जो कि शरीर के लिये खतरनाक है तेज धूप के कारण सीधे दिमाग पर असर होता है जिससे बेचैनी का अहसास होता है और दिमाग किसी भी कार्य को लेकर केन्द्रित नहीं हो पाता है
सूर्य की किरणों में उपस्थित अल्ट्रा वायलेट किरणें शरीर के लिये नुकसानदायक " रिएक्टिव ऑक्सीज़न स्पेसीज़ " नामक कणों का उत्पादन बढ़ा देती हैं ( जो कि स्किन कैंसर का एक प्रमुख कारण है ) परन्तु तरबूज ( कहीं-कहीं इसे 'हिरमाना' भी कहा जाता है) में पाये जाने वाला ' लाइकोपिन ' नामक तत्व उन्हें बेअसर कर देता है वस्तुतः लाइकोपिन एक ' एंटी ऑक्सीडेंट ' है जो कि हमारे शरीर के अन्दर मौज़ूद ' फ्री रैडिकल्स ' को निष्क्रिय बनाने का कार्य करता है तरबूज में विटामिन '' और 'सी' भी भरपूर मात्रा में होते हैं शायद इसीलिए प्रकृति ने इसे गर्मी के मौसम में हमें प्रदान किया है
गर्मी में लगातार पसीना निकलता रहता है , अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है ( गर्मी में , जाड़े की तुलना में शरीर को काम करने के लिए डेढ़ गुना ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है ) लोग इतना थक सकते है कि साँस लेने में भी दम लगाना पड़ता है , अब ऐसे में यदि आप भोजन में पोषण तत्वों की कमी कर बैठे तो आप को लगेगा कि आप दमा ( अस्थमा ) के मरीज़ तो नहीं ? पोटेशियम और सोडियम की कमी से धूप में चक्कर खा कर गिर भी सकते हैं तीखी गर्मी में शरीर का पानी सूखने पर उल्टी-दस्त शुरु हो सकता है अतएव खाली पेट धूप में निकलें , भोजन कम तथा पानी अधिक पीयें नींबू-पानी-नमक एवं चीनी के घोल का सेवन करें धूप और गर्म हवाओं का सामना करना अगर आपकी मज़बूरी है तो शरीर को गर्मी से जूझने के लिए तैयार कर लीजिये ! वैसे मौसम विभाग की मानें तो " लू " के थपेड़े अभी शुरु नहीं हुए हैं फिरभी लोग बदहाल हैं अब मई में गर्मी का यह हाल है तो जून में क्या होगा ?

Wednesday, 6 April 2011

अब जीने दो मुझे……



मैं थक गया हूँ न दे तू और ग़म नया मेरे हालात पे अब तो छोड़ दे मुझको

मैं अपने वहम में सुकून से जी लेता हूँ न तोड़ उनको अभी और जी लेने दे मुझको

रुसवाइयों का दौर कुछ रहा है बाक़ी ख़ाक बनकर सरेआम बिखरने दे मुझको

मैं तेरी नजरो में न फिर से कभी आऊंगा मेरे ख्यालों की दुनिया बसाने दे मुझको

तू अपनी दुनिया का नूर बनके यूं चमके दूर सहरा से नज़र आए आफ़ताब मुझको

साथ जितना भी दिया तूने बस वो ही काफी था अफसाना-ऐ-दर्द अब तो गुनगुनाने दे मुझको

Friday, 11 March 2011

कोई हम से पूछे


किसी अजनबी को दिल में बसाना क्या है
कोई हम से पूछे
उसकी यादों में ख़ुद को भुलाना क्या है
कोई हम से पूछे
दिल फ़िर टूट के बिखर गया तो क्या
उन टुकडो को चुन कर नए अरमान बनाना क्या है
कोई हम से पूछे

किसी के दूर होकर भी पास होना क्या है
कोई हम से पूछे
न उम्मीद होकर भी इंतज़ार करना क्या है
कोई हम से पूछे
दिल की बाज़ी हार गए तो क्या
अपना सब कुछ खोकर भी मुस्कुराना क्या है
कोई हम से पूछे

होठो को सिल कर सब कुछ सहना क्या है
कोई हम से पूछे
अपने अश्कों को पी कर दुसरो को हँसाना क्या है
कोई हम से पूछे
खुदा से गिला करे भी तो क्या
उसकी हर रजा में सर को झुकाना क्या है
कोई हम से पूछे

Saturday, 27 November 2010

Ek Pagli Ladki Ke Bin.......Kumar Vishwas ki Kalam se

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,

जब पिछवाडे के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घडियां टिक -टिक चलती हैं, सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से साड़ी यादें चुक जाती हैं,
जब उंच -नीच समझाने में माथे की नस दुख जाती हैं,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है .

जब पोथे खली होते हैं , जब हर सवाली होते हैं ,
जब ग़ज़लें रास नहीं आती , अफसाने गाली होते हैं .
जब बासी फीकी धुप समेटें दिन जल्दी ढल जाता है ,
जब सूरज का लास्खर छत से गलियों में देर से जाता है ,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मनन ही मनन घुट जाती है ,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है ,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मना करने पर भी पारो पढने आ जाती है,
जब अपना मनचाहा हर काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भरी लगता है.

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज सुने देती है ,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बडकी भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो ,
क्या लिखते हो लल्ला दिनभर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं ,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते हैं, घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का एक फोटो लाया जाता है ,
जब भाभी हमें मानती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है ,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भरी लगता है.

दीदी कहती हैं उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भइया तेरे जैसे प्यारे जस्बात नहीं ,
वोह पगली लड़की मेरे लिए नौ दिन भूकी रहती है,
चुप -चुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी न कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन में हूँ मजबूर बहुत, अम्मा -बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
यह कथा -कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के भी मरना भी भरी लगता है

Monday, 20 September 2010

दो आलसी!!!

किसी समय एक राज्य में बहुत सारे आलसी लोग हो गए। उन्होंने सारा काम-धाम करना छोड़ दिया। वे अपने लिए खाना भी नहीं बनाते थे। एक दिन सभी आलसियों ने राजा से जाकर कहा कि राजा को आलसियों के लिए एक आश्रम बनवाना चाहिए और उनके खाने की व्यवस्था करनी चाहिए।
राजा यह देखकर परेशान हो गया। कुछ सोचकर उसने अपने मंत्री को आलसियों के लिए एक बड़ा आश्रम बनाने का आदेश दिया। आश्रम के तैयार हो जाने पर सभी आलसी वहां जाकर सोने और खाने लगे।
एक दिन राजा ने अपने मंत्री को आलसियों के आश्रम में आग लगाने को कहा। आश्रम को जलता देखकर सभी आलसी तुरत-फुरत वहां से बच निकलने के लिए भाग लिए।
जलते हुए आश्रम के भीतर अभी भी दो आलसी सो रहे थे। पहले आलसी को पीठ पर आग की गरमी लगने लगी। उसने अपने आलसी दोस्त को यह बताया। “दूसरी करवट पर लेट जाओ” – दूसरे आलसी ने पहले को सुझाव दिया।
यह देखकर राजा ने अपने मंत्री से कहा – “केवल यही दोनों व्यक्ति ही सच्चे आलसी हैं। इन्हें भरपूर सोने और खाने दिया जाए”।